आपातकाल — अनुच्छेद (आख़िरी दो अंक)
11 वाक्यराष्ट्रगान बावन सेकंड का है।
राष्ट्रीय आपातकाल=अनु. 352 — युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह · केवल केंद्रीय मंत्रिमंडल की लिखित सलाह पर
प्रभात फेरी में तिरपन लोग
प्रभाव — उद्घोषणा के=अनु. 353 — संघ किसी भी राज्य को किसी भी विषय पर निर्देश दे सकता है · संसद राज्य सूची पर भी क़ानून बना सकती है
राशन का बँटवारा चौवन घरों में
राजस्व का बँटवारा — राष्ट्रपति बदल सकते हैं=अनु. 354 — आदेश अधिकतम उस वित्त वर्ष के अंत तक जिसमें आपातकाल ख़त्म हो; संसद के सामने रखना होता है
रक्षाबंधन पर पचपन राखियाँ बँधीं।
रक्षा — हर राज्य की, संघ का कर्तव्य=अनु. 355 — बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से बचाना, और देखना कि सरकार संविधान अनुसार चले
राजा के लिए छप्पन भोग बने।
राष्ट्रपति शासन (राज्य में)=अनु. 356 — राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता · राज्यपाल की रिपोर्ट पर "या अन्यथा"
विधायक जी सत्तावन दिन छुट्टी पर गए।
विधायी शक्तियाँ — राज्य की, संसद द्वारा=अनु. 357 — 356 के दौरान राज्य के क़ानून और बजट संसद पारित करती है; यह शक्ति राष्ट्रपति को दे सकती है
छह दोस्त अट्ठावन मिनट में अपने-आप सो गए।
छह स्वतंत्रताएँ (अनु. 19) — स्वतः निलंबन=अनु. 358 — केवल युद्ध या बाहरी आक्रमण पर, बिना आदेश के (सशस्त्र विद्रोह पर नहीं)
अदालत उनसठ दिन बंद रही।
अदालत जाने का अधिकार — राष्ट्रपति के आदेश से निलंबन=अनु. 359 — आदेश में गिनाए अधिकारों के प्रवर्तन के लिए न्यायालय जाना रुकता है; अधिकार मिटते नहीं · तीनों आधारों पर
विजय की जेब में साठ रुपये हैं।
वित्तीय आपातकाल=अनु. 360 — वित्तीय स्थिरता या साख को ख़तरा · कभी नहीं लगा
निर्देश पैंसठ बार ठुकराए।
निर्देश न मानना=अनु. 365 — राज्य संघ के निर्देश न माने तो राष्ट्रपति इसे संवैधानिक तंत्र की विफलता मान सकते हैं
इमरजेंसी में भी बीस और इक्कीस चालू रहे।
इमरजेंसी (राष्ट्रीय आपातकाल) में भी सुरक्षित=अनु. 20 (अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण) और 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता) कभी निलंबित नहीं — 44वाँ संशोधन, 1978
पहली, पाँचवीं, नौवीं और आख़िरी पंक्ति दूसरे पॉलिटी अध्यायों में भी इन्हीं शब्दों में है · 352 से भाग शुरू, 360 पर ख़त्म, बीच में 356 — कुल 9 अनुच्छेद · आपातकाल में संघ लगभग एकात्मक राज्य की तरह चलता है।