शैली — स्वर्णकाल
11 वाक्यसारे जगत में उदय हुआ।
उदयपुर शैली=महाराणा जगतसिंह प्रथम (1628–52) — इसी समय पहली बार मुग़ल असर
नाथ का राज
नाथद्वारा शैली=महाराणा राजसिंह (1672 से) — श्रीनाथजी की पिछवाइयाँ
चाव से अमर हुए।
चावंड शैली=अमरसिंह प्रथम — चित्रकार निसारदीन (रागमाला 1605) · शुरुआत प्रताप के समय
देव द्वारका में
देवगढ़ उप-शैली=रावत द्वारिकादास चूंडावत (1680) — चोखा, बख्ता
जोधा मान गया।
जोधपुर शैली=महाराजा मानसिंह (1803–43) — नाथ सम्प्रदाय के चित्र
बीवी की अनूठी कला
बीकानेर शैली=महाराजा अनूपसिंह — उस्ता (ऊँट की खाल पर सोना) और मथेरण परिवार
किशन साँवला है।
किशनगढ़ शैली=सावंतसिंह (नागरीदास), 1748–64
कोट और बूँदी दोनों उम्मीद से
कोटा शैली · बूँदी शैली=दोनों का स्वर्णकाल उम्मेदसिंह के समय · बूँदी में रंगविलास चित्रशाला (तारागढ़)
जय हो प्रताप की।
जयपुर शैली=सवाई प्रतापसिंह — सूरतखाने में 50 से ज़्यादा चित्रकार
अली विनम्र है।
अलवर शैली=महाराजा विनयसिंह — गणिकाओं के चित्र वाली अकेली शैली
जैसे ही मूली खाई
जैसलमेर शैली=महारावल मूलराज द्वितीय — मुग़ल असर से अछूती; प्रमुख चित्र "मूमल"
राजस्थानी चित्रकला की जन्मभूमि — मेवाड़। चार स्कूल — मेवाड़, मारवाड़, ढूँढाड़, हाड़ौती।